कर्नाटक

उत्तरा कन्नड़ में सदियों पुरानी वडगलाज्जी परंपरा, सफाई और आस्था का अनोखा संगम

Kavita2
2 Oct 2026 12:23 PM IST
उत्तरा कन्नड़ में सदियों पुरानी वडगलाज्जी परंपरा, सफाई और आस्था का अनोखा संगम
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कारकी। कर्नाटक के उत्तरा कन्नड़ जिले के तटीय गांवों में सदियों पुरानी एक अनोखी परंपरा आज भी जीवित है, जिसमें धार्मिक आस्था और स्वच्छता का अद्भुत मेल देखने को मिलता है। इस परंपरा के तहत ग्रामीण अपने घरों और आसपास के क्षेत्रों की व्यापक सफाई करते हैं, पुरानी और अनुपयोगी वस्तुओं को हटाते हैं और उन्हें चलती-फिरती देवी मानी जाने वाली ‘वडगलाज्जी’ को अर्पित करते हैं।

हाल ही में होन्नावर तालुक के कारकी गांव में यह पारंपरिक रस्म पूरे श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई गई। नेशनल हाईवे-66 के पास स्थित एक मंदिर में बड़ी संख्या में ग्रामीण जमा हुए और वडगलाज्जी को विभिन्न प्रकार की वस्तुएं अर्पित कीं। इस दौरान महिलाओं ने पारंपरिक तरीके से पूजा की और देवी के प्रति अपनी आस्था प्रकट की।

गांव की महिलाओं ने केसर और हल्दी लगाकर धार्मिक अनुष्ठान में हिस्सा लिया। कई महिलाओं ने हरी चूड़ियां पहनीं और देवी को साड़ियां, नारियल तथा पूजा की अन्य सामग्री भेंट की। स्थानीय लोगों के लिए यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि घर और परिवेश को साफ-सुथरा रखने से जुड़ी पीढ़ियों पुरानी जीवनशैली का हिस्सा भी है।

इस परंपरा की सबसे खास बात यह है कि इसमें घरों में लंबे समय से जमा बेकार वस्तुओं को बाहर निकालना जरूरी माना जाता है। लोग उन चीजों को हटाते हैं जिनका वर्षों से उपयोग नहीं हुआ है। पुराने बर्तन, खराब घरेलू सामान और दूसरे अनुपयोगी सामान को एकत्र कर वडगलाज्जी को अर्पित किया जाता है।

ग्रामीणों का मानना है कि घर और आसपास की जगह को साफ रखने से बीमारियों तथा कीड़ों के फैलने का खतरा कम होता है। इसलिए इस परंपरा में धार्मिक आस्था के साथ व्यावहारिक स्वच्छता का भी बड़ा महत्व है। गांवों में यह सोच पीढ़ियों से चली आ रही है कि घर में बेकार वस्तुओं को लंबे समय तक जमा रखने के बजाय समय-समय पर उन्हें हटाना चाहिए।

देशभर में गांधी जयंती के मौके पर स्वच्छता अभियान आयोजित किए जाते हैं और लोगों को अपने आसपास साफ-सफाई रखने के लिए प्रेरित किया जाता है। लेकिन उत्तरा कन्नड़ के इन तटीय गांवों में सफाई का यह विचार कोई नया अभियान नहीं है। यहां ग्रामीण सदियों से धार्मिक परंपरा के माध्यम से स्वच्छता को अपनी सामाजिक और सांस्कृतिक जीवनशैली का हिस्सा बनाए हुए हैं।

कारकी गांव में आयोजित रस्म के दौरान ग्रामीण सुबह से ही अपने घरों की सफाई में जुट गए थे। घरों के अंदर जमा धूल, पुरानी वस्तुएं और लंबे समय से उपयोग में नहीं आने वाला सामान अलग किया गया। इसके बाद लोग इस सामग्री को लेकर मंदिर पहुंचे और पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार वडगलाज्जी को अर्पित किया।

इस आयोजन में बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक की भागीदारी देखने को मिली। परिवार के सदस्य मिलकर घर की सफाई करते हैं और इसके बाद सामूहिक रूप से पूजा में शामिल होते हैं। इससे यह परंपरा धार्मिक अनुष्ठान के साथ-साथ सामुदायिक गतिविधि का भी रूप ले लेती है।

स्थानीय मान्यता में वडगलाज्जी को ऐसी देवी के रूप में देखा जाता है जो गांव-गांव घूमती हैं। ग्रामीण उनकी पूजा करते हुए घर से निकाली गई पुरानी वस्तुएं अर्पित करते हैं। देवी को साड़ी पहनाने, हल्दी-कुमकुम चढ़ाने और नारियल अर्पित करने की परंपरा भी लंबे समय से चली आ रही है।

महिलाओं की भूमिका इस अनुष्ठान में विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहती है। वे पूजा की तैयारियां करती हैं और पारंपरिक तरीके से देवी का श्रृंगार करती हैं। हरी चूड़ियां, साड़ियां और हल्दी-कुमकुम जैसे प्रतीक शुभता और समृद्धि से जोड़े जाते हैं।

ग्रामीणों के अनुसार यह परंपरा केवल धार्मिक विश्वास तक सीमित नहीं है। इसके पीछे स्वास्थ्य और स्वच्छता से जुड़ा व्यावहारिक संदेश भी मौजूद है। बरसात के बाद घरों और आसपास की जगहों पर नमी, कीड़े और गंदगी बढ़ सकती है। ऐसे में व्यापक सफाई से संक्रमण और बीमारी फैलने की आशंका कम करने में मदद मिलती है।

तटीय इलाकों की जलवायु में नमी अधिक रहने के कारण घरों की नियमित सफाई खास महत्व रखती है। पुराने और बेकार सामान में धूल, कीड़े या नमी जमा होने का खतरा रहता है। ऐसे में समय-समय पर इन वस्तुओं को हटाने की परंपरा स्थानीय जीवन के लिए उपयोगी मानी जाती है।

वडगलाज्जी से जुड़ी यह रस्म गांव के लोगों के बीच सामाजिक जुड़ाव भी बढ़ाती है। एक ही दिन पूरे गांव में सफाई और पूजा होने से सामूहिकता का माहौल बनता है। लोग एक-दूसरे के घरों और आसपास के क्षेत्रों को स्वच्छ रखने में भी सहयोग करते हैं।

कारकी में हुए आयोजन ने एक बार फिर दिखाया कि पारंपरिक रीति-रिवाज कई बार सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी व्यवहार से भी जुड़े होते हैं। यहां धर्म और स्वच्छता दो अलग-अलग बातें नहीं मानी जातीं, बल्कि दोनों एक-दूसरे के पूरक के रूप में दिखाई देते हैं।

गांधी जयंती के आसपास इस परंपरा का आयोजन होने से इसका स्वच्छता संदेश और भी खास हो जाता है। देश में जहां आधुनिक अभियानों के जरिए लोगों को सफाई के लिए जागरूक किया जाता है, वहीं उत्तरा कन्नड़ के इन गांवों में यही विचार पीढ़ियों से धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा बना हुआ है।

वडगलाज्जी की यह परंपरा आज भी ग्रामीण समाज में उतनी ही श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है। समय बदलने के बावजूद लोग अपने पूर्वजों से मिली इस विरासत को कायम रखे हुए हैं। कारकी गांव का हालिया आयोजन इसी बात का उदाहरण है कि यहां स्वच्छता केवल एक सरकारी संदेश नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था और दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा है।

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